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“क्वार”, “सामर्थ्य” और “शक्ति” का मिलन

“क्वार” का आरंभ “पितृपक्ष” से होता है। अपने पूर्वजों को स्मरण, नमन, वंदन और तर्पण करने का पखवाड़ा!


दार्शनिक दृष्टि से इसे “इतिहास विषयक पखवाड़ा” भी कहेंगे। वैज्ञानिक दृष्टि से इस पखवाड़े को “टाइम-मशीन” कहें, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।


वर्तमान युग में जीकर, अपने पूर्वजों को उत्तम गति प्रदान करने हेतु किए जाने वाले कार्य, एक दृष्टि से “टाइम-मशीन” ही हैं!


ये पखवाड़ा कैसे मानाया जाता है, या कि कैसे मनाना चाहिए? इस विषय पर कुछ भी कहना लोकभावनाओं के प्रति अनभिज्ञता होगी।


किन्तु फिर भी, जिस राष्ट्र में निरीह पशुओं का रक्त बहाना भी त्यौहार माना जा सकता है, वहाँ कमसकम भोज-आयोजन के एक पखवाड़े को बहस से दूर ही रखना चाहिए।


कहते हैं, महारथी कर्ण ने अपनी मृत्यु के बाद प्रभु श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि मुझे दान की इच्छा शेष है, अतः आप कुछ उपाय कीजिए।


प्रभु ने उन्हें सोलह दिन के लिए पृथ्वी पर आमंत्रित किया और इतने दिनों में महारथी कर्ण ने अपनी समग्र सम्पत्ति का दान किया।


दान में अत्यधिक व्यस्त रहने के कारण उन्हें अपने स्वरूप का भी स्मरण न रहा। उनके केश बढ़ गये, वे क्षौरकर्म न कर सके। उनके नख भी बढ़ गये। उन्होंने कोई नवीन वस्त्र तन पर नहीं डाला, न कोई नया कार्य किया।


केवल दान किया उन्होंने। और उनकी इसी स्थिति का अनुसरण लोक ने किया!


आज भी हिन्दू परिवारों में पितृपक्ष में कोई नवीन कार्य नहीं होता। न कोई नवीन वस्तु आती है, न वस्त्र। न ही क्षौरकर्म किया जाता है।

ये “क्वार” का बेफ़िकरा आरंभ है, उसकी जवानी है!


“क्वार” अपनी जवानी में कितना भी बेफ़िकरा हो जाए, मगर उसे अपने अस्तित्व के लिए एक ख़ूबसरत “मातृपक्ष” ही चाहिए!


और तब आता है, नवरात्र का पक्ष, मातृशक्ति का पक्ष, मातृपक्ष।


“पितृपक्ष” मस्तिष्क है “क्वार” का, तो “मातृपक्ष” हृदयस्थल है।


“पितृपक्ष” में मनुष्य अपने इतिहास को सुधारता है। “मातृपक्ष” के उपवास भविष्य को सुधारने की क़वायद हैं।


एक पक्ष में “पितरभोज” होता है, दूजे पक्ष में “कन्याभोज”। एक पक्ष सनातन बुद्धिमत्ता का प्रतीक है और दूजा है विराट हृदय का चिन्ह।


यदि आप गाँव की राजनैतिक विवेचना करना चाहें, तो “पितृपक्ष” से श्रेष्ठ समय और कोई नहीं। कौन किसके कितना क़रीब है, ये इसी पखवाड़े में मालूम होता है।


यथा, किसी व्यक्ति को अपने पिता का श्राद्ध करना है। तो ऐसे में, उस व्यक्ति को भोज का निमंत्रण भेजा जाएगा, जो उनके पिता के सर्वाधिक निकट होंगे।


ठीक ऐसा ही व्यवहार अन्य श्राद्धों में भी होता है। किंतु वैसा व्यवहार “मातृपक्ष” में नहीं होता!


इस पक्ष में सभी कन्याएँ आमंत्रित होती है। यहाँ हृदय से विचार किया जाता है। सुखद भविष्य की सुरक्षा हेतु देवी आदिशक्ति से आशीर्वाद की प्रार्थना की जाती है।

और फिर एक रोज़ “मातृपक्ष” भी सम्पन्न हो जाता है!


ये सम्पन्न होता है, राम की रावण विजय पर, माता सीता के राम से मिलन पर। इस पखवाड़े के समापन में ही छिपा है, “सामर्थ्य” और “शक्ति” का मिलन!


पूरे “क्वार” भर, राम का हृदय दग्ध रहा होगा। तब जाकर उन्हें माता सीता मिलीं।


ये प्रतीक्षा है “पितृपक्ष” की और ये उपहार है “मातृपक्ष” का!


अस्तु।

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