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भगवान की पीठ को प्रणाम कभी ना करे

मंदिर में परिक्रमा लेते समय भगवान या देवी की पीठ को प्रणाम करने का चलन बहुत हो गया है! किसी भी भगवान या देवी देवताओं की पीठ को प्रणाम करने से समस्त पुण्यों का नाश हो जाता है!


इसका प्रमाण भागवत कथा में एक प्रसंग में इस प्रकार बताया गया है कि जरासंध के साथ युद्ध के समय एक काल यवन नाम का राक्षस जरासंध की तरफ से युद्ध करने के लिए युद्ध स्थल में श्री कृष्ण जी से युद्ध करने आ गया।


काल यवन भयानक राक्षस के अलावा सत्कर्म करने वाला भी था। श्री कृष्ण भगवान जी इस राक्षस के वध के पहले इसके समस्त सत्कर्मों को नष्ट करना चाहते थे। सत्कर्म नष्ट होने से सिर्फ इस दुष्ट को दुष्टता के कर्मफल मिलें व उसका वध किया जा सके।

इसलिये श्री कृष्ण भगवान जी मैदान छोड़ कर भागने लग गये! भगवान आगे आगे राक्षस काल यवन पीछे-पीछे भाग रहा हैं।

इससे राक्षस काल यवन को भगवान की पीठ दिखती रही और उसके सभी सत्कर्मों का नाश होता रहा।

भगवान श्रीकृष्ण की इस युक्ति के पीछे यह राज था कि राक्षस काल यवन के अर्जित सत्कर्मों का नाश हो जाये ताकि दुष्ट को दुष्टता का फल मिल सके और उसे मारा जा सके।


जब काल यवन के समस्त सत्कर्म भगवान श्री कृष्ण के पीछे-पीछे दौड़कर पीठ देखने के कारण नष्ट हो गए उसके बाद ही उसका वध संभव हो सका ।


इसलिए कृपया किसी मंदिर की फेरी परिक्रमा लेते समय देवी-देवताओं की पीठ को प्रणाम न करें और न ही पीठ को देखें। बल्कि उनके सम्मुख हाथों को जोड़कर प्रार्थना, अर्चना व आराधना करें।

सनातन धर्म के अनुसार, मंदिर एक अलौकिक ऊर्जा के स्रोत अथवा उस ऊर्जा की स्थापना के साथ किये जाते है, और यह ऊर्जा वास्तु के ज्ञान से स्थापित करी जाती है, सबसे ज्यादा ऊर्जा भगवन के सम्मुख आकर प्राप्त होती है, क्योकि आप यथावत भगवन के चक्षु के सामने होते है

इस अज्ञानता को खत्म करने को ज्यादा से ज्यादा सज्जनों तक यह कथा पहुँचाने में सहयोगी बने, ताकि सबके सत्कर्मों को क्षीण होने से बचाया जा सके.


संस्कार क्रिया से शरीर, मन और आत्मा मे समन्वय और चेतना होती है, कृप्या अपने प्रश्न साझा करे, हम सदैव तत्पर रहते है आपके प्रश्नो के उत्तर देने के लिया, प्रश्न पूछने के लिया हमे ईमेल करे sanskar@hindusanskar.org संस्कार और आप, जीवन शैली है अच्छे समाज की, धन्यवाद् 

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