त्याग ,प्रेम और ईश्वर

त्याग और प्रेम का घनिष्ठ संबंध है।प्रेम से त्याग होता है एवं त्याग से प्रेम पुष्ट होता है।अतः प्रेमी भक्त को चाहिए कि अपने प्रेमास्पद प्रभु के नाते हरेक प्राणी को सुख पंहुचाने की भावना करता रहे।


इस भावना से मनुष्य का अन्तःकरण बहुत जल्दी शुद्ध हो जाता है और विशुद्ध अन्तःकरण में प्रेमास्पद प्रभु के प्रेम की लालसा अपने आप प्रकट हो जाती है।


प्रेम और मोह, दोनों में एक महीन अंतर है, प्रेम आप सबसे कर सकते है अपितु मोह आप न करे, श्री कृष्णा ने प्रेम सबसे करा पैर मोह ना तोह उन्होने अपने वैभव से करा, ना अपनी रासलीला से और ना ही अपनी भौतिक वस्तुओं से, उनका प्रेम सिर्फ निश्चल, निस्वार्थ और नारायण था।

अगर उन्हे मोह होता तो वो भी एक मनुष्य की तरह ना टूटने वाली भीष्म माया में फसे रहते और कभी भी द्वापर युग का समापन नहीं हो पाता अर्थात अगर नए को जन्म देना है तो मोह नहीं होना चाहिए बल्कि प्रेम करते रहे, आसक्ति एवं अनासक्ति, अनासक्त रहे आसक्त में


दूसरों के दिल में जगह बनाने के लिए वाणी में मधुरता अनिवार्य है।मधुर एवं मीठी वाणी हमें कोयल बनाती है,कर्कश वाणी हमें कौआ।


मधुर वाणी शीतल पानी की तरह होती है एवं कटु वाणी गर्म पानी की रह।पानी गर्म हो तो हाथ जल जाता है,वाणी गर्म हो तो ह्दय झुलस जाता है।


अगर आदमी कटुता और चिड़चिड़ेपन के साथ बोलता है ,तो कौन उससे बात करना चाहेगा? मूल्य इस बात का उतना नहीं है कि आप क्या बोले,बल्कि इसका मूल्य ज्यादा है कि आप किस तरीके से बोले कितनी मिठास के साथ हमने वाणी का उपयोग किया।


संस्कार क्रिया से शरीर, मन और आत्मा मे समन्वय और चेतना होती है, कृप्या अपने प्रश्न साझा करे, हम सदैव तत्पर रहते है आपके प्रश्नो के उत्तर देने के लिया, शास्त्री जी से प्रश्न पूछने के लिया हमे ईमेल करे sanskar@hindusanskar.org संस्कार और आप, जीवन शैली है अच्छे समाज की, धन्यवाद् 

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